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द्रापे॒ऽअन्ध॑सस्पते॒ दरि॑द्र॒ नील॑लोहित। आ॒सां प्र॒जाना॑मे॒षां प॑शू॒नां मा भे॒र्मा रो॒ङ् मो च॑ नः॒ किं च॒नाम॑मत् ॥४७ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

द्रापे॑। अन्ध॑सः। प॒ते॒। दरि॑द्र। नील॑लोहि॒तेति॒ नील॑ऽलोहित। आ॒साम्। प्र॒जाना॒मिति॑ प्र॒ऽजाना॑म्। ए॒षाम्। प॒शू॒नाम्। मा। भेः॒। मा। रो॒क्। मोऽइति॒ मो। च॒। नः॒। किम्। च॒न। आ॒म॒म॒त् ॥४७ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:16» मन्त्र:47


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर वही विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (द्रापे) निन्दित गति से रक्षक (अन्धसः) अन्न आदि के (पते) स्वामी (दरिद्र) दरिद्रता को प्राप्त हुए (नीललोहित) नीलवर्णयुक्त पदार्थों का सेवन करने हारे राजा वा प्रजा के पुरुष ! तू (आसाम्) इन प्रत्यक्ष (प्रजानाम्) मनुष्यादि (च) और (एषाम्) इन (पशूनाम्) गौ आदि पशुओं के रक्षक होके इनसे (मा) (भेः) मत भय को प्राप्त कर (मा) (रोक्) मत रोग को प्राप्त कर (नः) हम को और अन्य (किम्) किसी को (चन) भी (मो) मत (आममत्) रोगी करे ॥४७ ॥
भावार्थभाषाः - जो धनाढ्य हैं, वे दरिद्रों का पालन करें तथा जो राजा और प्रजा के पुरुष हैं, वे प्रजा के पशुओं को कभी न मारें, जिससे प्रजा में सब प्रकार सब का सुख बढ़े ॥४७ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

(द्रापे) यो द्रः कुत्साया गतेः पाति रक्षति तत्संबुद्धौ (अन्धसः) अन्नादेः (पते) स्वामी (दरिद्र) यो दरिद्राति तत्सम्बुद्धौ (नीललोहित) यो नीलान् वर्णान् रोहयति तत्सम्बुद्धौ (आसाम्) प्रत्यक्षाणाम् (प्रजानाम्) मनुष्यादीनाम् (एषाम्) (पशूनाम्) गवादीनाम् (मा) (भेः) मा भयं प्रापयेः (मा) (रोक्) रोगं कुर्याः (मो) (च) (नः) अस्मान् (किम्) (चन) (आममत्) अम रोगे। अमागमो लङि रूपम् ॥४७ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे द्रापे अन्धसस्पते दरिद्र नीललोहित राजप्रजाजन ! त्वमासां प्रजानामेषां पशूनां च सकाशान्मा भेः। मा रोक् नोऽस्मान् किञ्चन मो आममत् ॥४७ ॥
भावार्थभाषाः - य आढ्यास्ते दरिद्रान् पालयेयुर्ये राजप्रजाजनास्ते प्रजापशुहिंसनं कदापि मा कुर्युर्यतः सर्वेषां सुखं वर्द्धेत ॥४७ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जे धनाढ्य असतात त्यांनी दरिद्री लोकांचे पालन करावे. राजा व प्रजा यांनी पशूंना कधीही मारू नये, कारण पशूंमुळे प्रजेचे सुख वाढते.